मैंने किस्मत का खेल देखा (कविता) मैंने किस्मत का ऐसा खेल देखा प्रतिभाओं को छुपते देखा जीरो को चमकते देखा मन के अंदर डर को देखा डर से आतंकित मन ने सब को नीचा करते देखा मैंने किस्मत का ऐसा खेल देखा........ जुल्मों को होते आंखों देखा अपराधबोध होकर मैंने किस्मत पर आरोप लगाकर देखा कर्तव्य विमुख होकर किस्मत का रोना देखा ईश्वर से झोली भरते देखा मानव से खाली झोली करते देखा किस्मत से संधि करते देखा मान सम्मान को गिरते देखा मैंने किस्मत का ऐसा खेल देखा गुलाम बनाते अहंकार को देखा चुटकी में किस्मत को बदलते देखा आदमी को समाज की कठपुतली बनते देखा मैंने किस्मत का ऐसा खेल देखा अपनों से अपनों का तिरस्कार देखा अपनों से परायो जैसा बर्ताव देखा किस्मत से विश्वास उठते देखा वक्त की जंजीरों स...