वीररस कविता

 शीर्षक      -----      छाले मेरा क्या  बिगाडेंगे_ _ _


   छाले मेरा क्या बिगाड़़लेंगे
 ठाना है मैंने मंजिल को पाना

 राह  पथरीली ककंरीली  है 
जिद मेरी भी हठीली है
 पाऊंगा मंजिल एक दिन
 जीवन की रीत यही है

छाले मेरा क्या बिगाड़लेंगे
 ठाना है मैंने मंजिल को पाना

 कम ना होने दूंगा साहस
 हर कांटे को निकालूंगा
 चलते चलते पाऊंगा चाहत
 और मंजिल को पाऊंगा

छाले मेरा क्या बिगाड़लेंगे
 ठाना है मैंने मंजिल को पाना

 राम कृष्ण का वंशज हूं मैं
 उनके गुण दोहराउंगा
 धैर्य शौर्य से एक दिन में
 अपनी मंजिल पाऊंगा

छाले मेरा क्या बिगाड़लेंगे
 ठाना है मैंने मंजिल को पाना
                                               - छोटे गणेश ( अभय ) 

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